आज कश्मीरी महिलाओं का प्रतिरोध दिवस है, 28 साल पहले की उस घटना के खिलाफ जिसपर सब चुप हैं या मर गए हैं!

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जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के कुनान और पोशपोरा गांंव में 23 फरवरी 1991 की रात कहर बन कर बरसी थी. भारतीय फौज की 68 ब्रिगेड की 4 राजपुताना राइफल्स के जवानों पर गांव की महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना सामने आई. दुख की बात ये है कि इस घटना के 28 साल बाद भी वहां के लोगों को इंसाफ नहीं मिला है.

Credit- Catch News

5 लेखिकाओं की किताब ‘Do you Remember Kunan Poshpora?’ में महिलाओं की आपबीति और उस डर की खौफनाक कहानियां मिल जाएंगी. उन महिलाओं की कहानी जो अब तक इंसाफ का इंतजार कर रही हैं. इन लेखिकाओं के नाम हैं- एसार बतूल, समरीना मुश्ताक, मुंजा राशीद, इफरा बट और नताशा रातहर. ये लेखिकाएं कश्मीर में महिलाओं के खिलाफ यौन-हिंसा और इम्प्यूनिटी पर काम कर रही हैं.

28 साल पहले चौथी राजपूताना राइफल्स राइफल्स और 69 माउंटेन ब्रिगेड ने इन दो गांवों में सर्च एंड कॉर्डन ऑपरेशन शुरू किया. इस ऑपरेशन में सेना की टुकड़ी गांव को घेर लेती है. उस गांव के घर के पुरुषों को बाहर निकालकर उनकी शिनाख्त की जाती है. घर के अंदर सिर्फ महिलाएं और बच्चे रहते हैं. घर के अंदर घुसकर भी तलाशी ली जाती है. आइए इस किताब में लिखी गई कुछ सच्ची और भयानक दास्तां से आपको रूबरू करवाएं-

“दुर्री के दरवाजे पर दस्तक”

मैंने और मेरी बहन ने एक दूसरे को कस कर पकड़ा था. हमें दरवाजे की उस दस्तक से डर लग रही थी. ऐसा लग रहा था जैसे कोई उस दरवाजे को तोड़ना चाह रहा हो. मेरे दादाजी ने तुरंत उठकर दरवाजा खोला. मैंने कुछ आवाज सुनी, “कितने आदमी हैं घर में”. उन्होंने कहा, “कोई नहीं मैं हूं.” मैंने उठने की कोशिश की. लेकिन मुझे किसी ने रोक लिया. वो अमीना थी. उसने मेरा हाथ पकड़ लिया था. अमीना, फातिमा और मैं ध्यान से सुन रही थी. फिर मैंने अपनी मां की आवाज सुनी. मेरी मां उनसे मिन्नते कर रही थीं. समय बीता भी नहीं था कि चिल्लाने की आवाज आई. और हमने एक सैनिक को अपने सामने खड़ा पाया. उससे कुछ अजीब सी महक आ रही थी और उसके हाथ में शराब की बोतल थी.

मेरा गला सूख गया. मैं चिल्ला भी नहीं पा रही थी ना ही खड़ी हो पा रही थी. ऐसा लग रहा था जैसे धरती में धंस रही हूं.मेरे दोनों तरफ मेरी बहन फातिमा और अमीना थे. उन्होंने मेरी बांह को जोर से पकड़ रखा था. उस एक सैनिक के साथ 6 और अंदर आ गए. मैं चिल्लाना चाहती थी. मुझे अपने दादाजी की आवाज भी नहीं आ रही थी. मुझे नहीं पता था कि वो मेरी मां को कहां लेकर गए थे. उनमें से एक ने मेरे बाल जोर से पकड़कर मुझे खींचा. मैंने उसके पैर पकड़े, उससे भीख मांगते हुए कहा कि हमें छोड़ दे, हमने कुछ नहीं किया. मैंने अपना माथा भी उसके जूते के सामने रगड़ा. वो मुझे घसीटते हुए किचन में ले गया. मेरी मां भी वहीं थी. मैंने जोर से चिल्ला के कहा कि मां मुझे बचा लो. वो कैसे बचा सकती थी, मैं नहीं बता सकती कि उनके साथ क्या होते हुए मैंने देखा. मेरा कपड़ा चीर लिया गया और मेरी जिंदगी भी वैसे ही खत्म हो गई.

जब मुझे होश आया तब मैं सुन्न पड़ी थी. मेरा चेहरा आंसुओं से भीगा हुआ था. मेरे बदन पर एक भी कपड़ा नहीं था. मेरी आत्मा भी ऐसी ही हो गई थी. मेरी मां भी उसी कमरे में थी. शायद वो बेहोश थी. मैंने किसी को चिल्लाते हुए सुना. वो मेरा भाई था. उसने मुझे किसी कपड़े से ढका. मैं अपने शरीर के निचले भाग को महसूस भी नहीं कर पा रही थी. उस रात के बारे में फिर किसी ने बात नहीं की. उस रात के काले साये ने जिंदगी भर मेरा पीछा किया. चाहे मैं कुछ कहूं, कुछ सोचूं और कुछ करूं वो रात मैं नहीं भूल सकती.

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