करोड़पति होने के बावजूद छोले-कुल्चे का ठेला क्यों लगाती हैं उर्वशी यादव? कारण जानकर गर्व होगा

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देश में कई ऐसे लोग हैं जिनकी छोटी सी कोशिश दूसरों के लिए मिसाल बन जाती है. ऐसी मिसाल जो सिखाती है कि जिंदगी किसी मुश्किल के सामने छोटी नहीं पड़ सकती. गुरुग्राम की उर्वशी यादव की जिंदगी भी मिसाल है. दिखावे से भरी इस दुनिया में ‘करोड़पति’ उर्वशी कुछ ऐसा करती हैं जिसे जानकर आपको गर्व होगा.

उर्वशी यादव (फोटो-फेसबुक)

कभी टीचर रह चुकी उर्वशी बेचती हैं छोले-कुल्चे

गुरुग्राम में उर्वशी छोले-कुल्चे बेचती हैं. चाहें धूप हो या बारिश उनका ठेला अपने ठीक समय पर निर्धारित जगह पर तैयार रहता है. खाना बनाने की शौकीन उर्वशी पहले प्राइवेट स्कूल में टीचर रह चुकी हैं, ये जानकार आप शायद चौंक जाएं की उनके पति एक बड़े कंस्ट्रक्शन साइट के डायरेक्टर रह चुके हैं.

क्यों लगाना पड़ा छोले-कुल्चे का ठेला

एक भयानक सड़क हादसे में उर्वशी के पति गंभीर रूप से जख्मी हो गए. महीनों तक बेड पर ही पड़े रहे. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अब भी काम पर जाने की स्थिति में नहीं हैं. धीरे-धीरे घर की सेविंग दवाईयों में खत्म होने लगी थी औऱ टीचिंग की जॉब में उर्वशी पैसे नहीं बचा पा रही थी.

कैसे आया छोले-कुल्चे के ठेले का आइडिया

हिंदुस्तान टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, उर्वशी ने अपने पति के लिए दवाईयां लाते वक्त छोले-कुल्चे का ठेला लगाने वालों को देखा था. उर्वशी को पहले से ही खाना बनाने में रूचि थी, ऐसे में उन्होंने तय किया कि वो अपने शौक को बतौर रोजगार के तौर पर देखेंगी.

शुरुआत में घरवाले राजी नहीं, अब देते हैं साथ

जाहिर है कि एक संपन्न परिवार की शादीशुदा महिला अगर ठेला लगाने का फैसला करती है तो अपने समाज के मुताबिक उसके परिवार वाले तो नाराज ही होंगे. वहीं नामी स्कूलों में पढ़ने वाले उर्वशी के बच्चों को भी ये पसंद नहीं था. लेकिन परिवार को इस सपोर्ट से मदद मिली और अब सब खुश हैं.

सोशल मीडिया पर हिट हैं उर्वशी

उर्वशी की कहानी कई वेबसाइट और सोशल मीडिया पर आने के बाद उनके दुकान पर लोगों को तांता लगा रहता है. लोग छोले-कुल्चे खाने के साथ ही उर्वशी की कहानी भी जानना पसंद करते हैं.

महंगा घर और कार है उर्वशी के पास

बता दें कि उर्वशी का गुरुग्राम में ही अच्छा खासा घर है और उनके पास एक महंगी कार भी है, लेकिन उर्वशी शायद यही चाहती हैं कि सिर्फ वो अपने परिवार के पैसे पर ही जिंदा नहीं रहे, अपने पति और बच्चों के लिए अपना योगदान भी दे सकें.

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