दमदार, स्वभाव से विद्रोही ममता बनर्जी के अब तक के ‘दबंग’ सफर के बारे में जानिए खास बातें

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देश की सबसे दमदार और प्रभावशाली नेताओं में से एक मानी जाने वाली ममता बनर्जी एक बार फिर सुर्खियों में हैं. इस बार उनकी सीधी भिड़ंत नरेंद्र मोदी सरकार से है. ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार के अधीन काम करने वाली सीबीआई को अपने राज्य में कार्रवाई से रोक दिया है. मामला जो भी हो इरादा ये है कि ममता अब मोदी सरकार से दो-दो हाथ करने के लिए तैयार हैं. विपक्षी पार्टियों के नेता भी उनके साथ दिख रहे हैं. उनके इस विद्रोही स्वभाव को देखते हुए हाल ही में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने ममता बनर्जी को ‘जन्मजात विद्रोही’ बताया था. विद्रोह, जज्बे के दम पर आज राजनीति में बुलंदियां हासिल कर चुकी ममता बनर्जी के बारे में जानते हैं कुछ खास जानकारी-

फोटो-Zee News

कांग्रेस के साथ की थी राजनीतिक करियर की शुरुआत

5 जनवरी 1955 में मध्यम वर्गीय परिवार में ममता बनर्जी का जन्म हुआ था. उन्होंने अपना राजनीतिक सफर कांग्रेस के साथ शुरू किया. 1970 के दशक में वो कांग्रेस की सक्रिय कार्यकर्ता बन गई थीं. राजनीति में उनकी पहचान उस घटना के बाद बनी जब वो जेपी आंदोलन वाले जेपी यानी जयप्रकाश नारायण की कार के बोनट पर चढ़कर उनक विरोध करने लगी थी.

  • 1976-1980 के बीच वो राज्य महिला कांग्रेस की महासचिव रहीं.
  • 1984 में कोलकाता के जादवपुर से साम्यवादी नेता सोमनाथ चटर्जी को चुनाव में हराकर सबसे युवा भारतीय सांसद बनीं.
  • 1991 में नरसिम्हाराव सरकार में मानव संसाधन, युवा कल्याण, खेलकूद और महिला बाल विकास विभाग की राज्यमंत्री  रहीं.
  • 2009 से 2011 के दौरान केंद्र सरकार में रेल मंत्री भी रही, फिलहाल वो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं
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सत्ता के भीतर और बाहर रहते हुए विरोध

सन् 1996 में केंद्रीय मंत्री रहते हुए उन्होंने अपनी ही सरकार द्वारा बढ़ाई गई पेट्रोल की कीमतें बढ़ाए जाने का विरोध किया था. कुछ समय बाद उन्होंने कांग्रेस में मतभेदों के चलते पार्टी छोड़ दी और 1998 में ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की. उन्होंने पश्चिम बंगाल में कम समय में ही अपनी पार्टी की नींव मजबूत कर दी.

टाटा को पांव नहीं जमाने दिया

सिंगूर में पश्चिम बंगाल की कम्यूनिस्ट सरकार ने टाटा मोटर्स को नैनो प्लांट लगाने की इजाजत दी थी. लीज पर टाटा मोटर्स को 997 एकड़ जमीन पर नैनो के लिए कारखाना लगाने की अनुमति दी गई. ममता तब विपक्ष में थीं और शुरू से ही इसका विरोध कर रही थीं. मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने कानून बनाकर सिंगूर के करीब 1000 एकड़ जमीन उन किसानों को वापिस करने का फैसला लिया जिन्होंने कारखाने के लिए ये जमीन दी थी.

ममता के इस सफर में कई उतार चढ़ाव

फोटो-IndiaTV news

1999 में NDA के साथ गठबंधन कर वो पुन: सरकार में लौटीं और उन्होंने केंद्रीय रेल मंत्री के पद संभाला. साल 2001 में उन्होंने अपने ऊपर लगे आरोपों के विरोध में गठबंधन तोड़ लिया लेकिन 2004 में फिर उन्होंने NDA से हाथ मिलाया. 2006 के विधानसभा चुनावों में ममता को बुरी हार का सामना करना पड़ा. सन 2011 के उपचुनावों में ममता बनर्जी ने दमदार वापसी की. 20 मई 2011 को वो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनीं.

गुस्सैल हैं ममता ‘दीदी’

ममता बनर्जी के बारे में कहा जाता है कि वो बहुत ही गुस्से वाली हैं. आपने गौर किया होगा वो हमेशा ही सफेद साड़ी और चप्पल में रहती हैं. माना जाता है कि वो जरूरत के हिसाब से ही कपड़े रखती हैं. शुरू से ही उन्होंने अपना जीवन समाज सेवा में लगा दिया और कभी शादी नहीं की.

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