मिनिमन इनकम गारंटी योजना में कांग्रेस इमदाद बांटेगी कहां से? आर्थिक घोषणाओं पर लगाम कसना जरूरी

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पहले भी सरकार के बिजली बिल, किसान कर्ज माफी जैसे कदमों से पीड़ित वर्ग का हित होने के बजाय बांटने वालों का भला जरूर हुआ है। किसानों के आत्महत्या करने जैसी घटनाएं थम नहीं रहीं बल्कि सरकार के बिल-कर्ज माफी जैसे फैसलों से अपना बिल और किश्त समय पर चुकाने वाले नागरिक खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं।

मतलब साफ है पार्टियों के द्वारा भविष्य में घोषणाओं की पूर्ति के लिए किया जाने वाला वित्तीय एडजस्टमेंट टैक्स के बोझ के रूप में जनता को ही भुगतना होगा।

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मशीन में आलू डालकर सोना बनाने के वादे के बाद अब होनहार बिरवान ने देश के कल्याण की नई ट्रिक बताई है। सवाल उठता है कि जब आलू से सोना बनाकर दिखाना तो दूर उसकी विधि तक नहीं बताई गई, तब वोटर्स कैसे अबकी बार मिनिमम इनकम गारंटी योजना वाले आश्वासन पर यकीन करें।

ठीक ऐसे ही केंद्र सरकार ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में तमाम वादे किए थे जो अमल में नहीं आ पाए। स्वच्छता केवल पोस्टर-बैनर में दिख रही है। जापान की वोल्गा नदी में परखी जा चुकी लेटेस्ट माइक्रोबल टेक्नोलॉजी से गंगा नदी की सफाई की हकीकत किसी से नहीं छिपी। ऊपर से अब दावा किया जा रहा है कि भारत के 10 शहर दुनिया की टॉप 10 सिटीज़ में शुमार होंगे!

SOURCE- downtoearth.com

इधर इतिहास बताता है गोल्डन आलू वाले जादू और मिनिमम इनकम गारंटी स्कीम की ट्रिक से टैक्स पेयर्स की जेब ही खाली होगी। यदि भविष्य में भारत के कोषागार से जुड़ीं घोषणाओं पर कुछ मानदंड लागू कर दिए जाएं तो नागरिकों को बेवजह पड़ने वाले टैक्स के बोझ से राहत मिल सकती है।

आर्थिक हित संबंधी घोषणा करने से पहले उसमें लगने वाले आवश्यक फंड का इंतजाम घोषणाकारी पार्टियों को करने की बाध्यता सुनिश्चित करना एक उपाय है। इससे ऐसी घोषणाओं से जुड़ीं परेशानियों से भी निज़ात मिल सकती है। इस अनिवार्यता से पार्टियों पर खुद धन जुटाने की जिम्मेदारी होगी जिससे वो कोरी घोषणाएं करने से पहले दस बार सोचेंगी।   

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