भारत में दिवाली पर क्यों पटाखा फोड़ते हैं? इसका इतिहास क्या है?

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दिवाली मतलब रोशनी का त्योहार. देश के कई इलाकों में इसे रोशनी के साथ-साथ पटाखों का भी त्योहार माना जाता है. कई प्रतिबंधों के बावजूद भी देश में पटाखों का चलन बरकरार है. ऐसे में हम आपको बताते हैं कि इन पटाखों का इतिहास क्या है.

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भारत की बात करें तो अपने देश के प्राचीन ग्रंथों में दिवाली को खुशी और रोशनी का त्योहार माना जाता था. शोर का नहीं. लेकिन ये परंपरा चीन से होती हुई भारत में आई. चीन में मान्यता थी कि पटाखों के शोर से बुरी आत्माएं औऱ दुर्भाग्य भाग जाता है. बीबीसी की एक रिपोर्ट में जानकारों के हवाले से कहा गया है कि भारत में शायद पटाखों का विचार आतिश दीपांकर नाम के एक बंगाली बौद्ध धर्मगुरू 12वीं सदी में लेकर आए, जो शायद इसे पूर्व एशिया, चीन, तिब्बत ये सीख कर आए थे.

फोटो- हैरिटेज लैब

चीन में पटाखे के आविष्कार का ये किस्सा है कि इसकी खोज खाना बनाते समय एक एक्सिडेंट में हुआ. दरअसल, ये कहा जाता है कि एक रसोइए ने मसालेदार खाना बनाने के चक्कर में गलती से साल्टपीटर यानी पोटैशियम नाईट्रेट आग पर डाल दिया था. इससे उठने वाली लपटें रंगीन हो गईं, जिस से लोगों की उत्सुकता बढ़ी. प्रयोग को आगे बढ़ाते हुए कोयले और सल्फर का मिश्रण आग के हवाले कर दिया, जिससे काफी तेज़ आवाज़ के साथ रंगीन लपटें उठीं. और हो गई रंग बिरंगे आतिशबाजी की खोज.

अपने देश में ये भी धारणा है कि पटाखे तो मुगल लेकर आए थे क्योंकि उनके दौर में आतिशबाजी और पटाखे खूब इस्तेमाल हुआ करते थे. दारा शिकोह की शादी की पेंटिंग में लोग पटाखे चलाते हुए देखे जा सकते थे. लेकिन जानकार मानते हैं कि पटाखे देश में इससे पहले भी जलाए जाते थे. लेकिन दिवाली पर इसके जलाने का ऐसा कोई चलन नहीं था्.

ये को हर एक को मालूम है कि अगर आपको कुछ बेचना है तो अपने देश में किसी मान्यता से जोड़ दीजिए. यही हुआ आधुनिक भारत में पहली पटाखा फैक्ट्री साल 1940 में कोलकाता में शुरू हुई. लेकिन आजादी के बाद तमिलनाडु का शिवकाशी पटाखा उद्योग का सबसे बड़ा गढ़ बन गया. हालात ये है कि देश के ज्यादातर पटाखे वहीं बनाए जाते हैं. औऱ धीरे-धीरे दीवाली पर पटाखा फोड़ने का चलन भी बढ़ गया है जो अब चरस बनता जा रहा है. पर्यावरण, बीमारी और बाल मजदूरी को ताक पर रखते हुए ऐसी इंडस्ट्री खूब चल भी रही है और जमकर पटाखे भी फोड़े जा रहे हैं.

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