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Women’s Day: आज भी अगर महिलाओं के हक की आवाज उठानी पड़ रही है तो ये शर्मनाक है!

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पूरी दुनिया अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मना रही है. महिलाओं की आजादी, उनके सम्मान और समाज में समानता की बहस एक बार फिर एक दिन के लिए होगी. समानता, स्वतंत्रता, सम्मान का अंत इस दिन को विशेष तौर पर मनाने के साथ ही हो जाता है क्योंकि अगर आज भी आधी आबादी के हक पर बहस करने की जरूरत पड़ रही है, आज भी एक विशेष दिवस पर लोगों को समझाना पड़ रहा है कि महिलाओं का सम्मान करें, घर की महिलाएं हों या बाहर की, उनके साथ बेहतर व्यवहार करें, तो अभी भी हमें ये कहने अधिकार नहीं रह गया है कि हम आगे बढ़ रहे हैं.

फोटो-इंडियन एक्सप्रेस

कहां क्रेंदित हो महिला विमर्श?

अपने कुछ सहकर्मियों के साथ महिला दिवस पर चर्चा हो रही थी. उस दौरान ये बात सामने आई कि जब तक हम महिला विमर्श में लैंगिक भेदभाव का मुद्दा उठाते रहेंगे, इस पूरे बहस को महिलाओं के शरीर पर केंद्रित करते रहेंगे, तब तक महिलाओं की तरक्की के लिए ईमानदारी से कोई कदम नहीं उठाया जा सकेगा. ये सही है कि महिलाओं के सम्मान, आजादी, समानता की चर्चा महिलाओं के उत्पीड़न पर क्रेंदित हो ही जाती है. लेकिन जब भारतीय समाज, जिसे बहुत गर्व से संस्कारी बताया जाता है, उस तथाकथित सर्वेश्रेष्ठ संस्कृति में महिलाओं को उपभोग की वस्तु से ज्यादा कुछ माना ही नहीं जाता, जहां महिलाओं को सदियों से संपत्ति समझा गया है, जहां बच्ची, लड़की, किशोरी, युवती, महिला के साथ छेड़छाड़ को हमेशा से स्वीकृति दी गई है, जहां हर रोज बलात्कार हो रहे हैं और दोषियों को सजा दिलाना भी मुश्किल है.

क्या हमें दरिंदों के मुताबिक रहना होगा?

फोटो-ट्विटर

जब टारगेट महिलाओं का शरीर ही है, तो बहस भी उसी पर होगी. जब तक महिलाओं को देखकर लड़कों से गलतियां होती रहेंगी, जब तक महिलाओं को अपने कपड़ों का चुनाव इस आधार पर करना रहेगा कि कहीं उनके कपड़े देखकर सामने वाले के मन में छेड़ने या रेप का ख्याल ना आ जाए, जब तक हमें अपनी जरूरत और मर्जी से नहीं, बल्कि रात के अंधेरे या दिन के उजाले के हिसाब से बाहर निकलने का वक्त तय करना पड़ेगा. जब तक इस समाज में अच्छी और बुरी लड़की की पहचान के मानक स्थापित करना बंद नहीं किया जाएगा. तब तक कोई दिवस, कोई योजना, कोई घोषणा, कोई कदम कामयाब नहीं हो सकता.

गलती किसकी है?

चर्चा के दौरान ये सवाल भी किया गया कि क्या महिलाओं की हर समस्या के जिम्मेदार पुरुष हैं, क्या महिलाओं को पुरुषों से कोई सहयोग नहीं मिलता, क्या महिलाएं खुद भी जिम्मेदार नहीं हैं. इसका जवाब क्या दिया जा सकता है, किसी भी समस्या के लिए किसी एक वर्ग को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. जाहिर है हर तरफ से किए गए प्रयास में कोई ना कोई कमी होगी. जो सोच सदियों से लोगों के दिमाग में घर कर गई है, उसे चुनौती देना आसान नहीं है, उसे बदलना मुश्किल भी है. अपनी समस्या के लिए हम महिलाएं भी जिम्मेदार हैं क्योंकि जब हमें दबाया जाता है, तो हम में से ज्यादातर महिलाएं दब जाती हैं, जब हमें कुछ गलत होते हुए भी चुप कराया जाता है, तो हम में से ज्यादातार महिलाएं चुप हो जाती हैं, हम अपने ऊपर हुए अन्याय के बदले न्याय के लिए लड़ नहीं पाते हैं, डर जाते हैं, तो गलती हमारी है.

फोटो- AIDWA

हम कब तक गलत का साथ देते रहेंगे?

हम हर रोज की छेड़छाड़, कमेंट्स, हरकतों को इग्नोर करते हैं, उसके खिलाफ आवाज नहीं उठाते हैं, ये हमारी ही गलती है. देर रात अकेले घर से बाहर ना जाएं क्योंकि रात का अंधेरा, बाहर अकेली लड़की, खुद रेपिस्ट को न्यौता दे रही है. समाज और परिवार ने ये तय कर दिया कि रात में लड़कियों को अकेले बाहर नहीं निकलना है, अगर बाहर निकलीं तो रेपिस्टों को बलात्कार या उत्पीड़ित करने का हक मिल जाएगा. हमने भी ये मान लिया और बाहर निकलना छोड़ दिया, यही है हमारी गलती, बल्कि होना ये चाहिए था कि इस स्थिति को चुनौती मिलनी चाहिए थी. समाज, शासन-प्रशासन और विशेषकर महिलाओं को ये सुनिश्चित कराना चाहिए था कि हम समझौता नहीं करेंगे. जो ‘गलत’ है, उसे ‘सही’ करने की जरूरत है, ‘सही’ को समझौता नहीं करना है.

क्या ये सभी के लिए शर्म की बात नहीं है?

ये कितनी शर्म की बात है कि आज हालात ये हैं कि किसी भी आदमी पर हम भरोसा नहीं कर सकते. भले ही सभी पुरुष गलत ना हों, लेकिन डर सभी से लगेगा. हमें नहीं पता कि कब किसकी नीयत खराब हो जाए. क्या ऐसा माहौल संभव ही नहीं है, जिसमें किसी को कोई असुविधा ना हो, महिला हो या पुरुष अपने हिसाब से रहें, काम करें और जिंदगी में आगे बढ़ें. किसी के हक की मांग ना करनी पड़े, हमें हमारे मौलिक अधिकार एहसान के तौर पर ना दिए जाएं. महिला दिवस मने या ना मने, जो आजादी, जो अवसर, जो माहौल, जो अधिकार इस समाज में पुरुषों के पास हैं, वही महिलाओं को भी मिले, फिर कोई विशेष दिवस मनाने की जरूरत नहीं होगी.

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