अपना देश महिलाओं के नेतृत्व पर भरोसा नहीं करता? चुनावी आंकड़े तो यही कहते हैं

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संसद में महिला प्रतिनिधियों के आधार पर साल 2019 में भारत 193 देश की लिस्ट में 149वें स्थान पर है. पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश को पीछे छोड़कर भारत 2018 के बाद से 3 स्थान और गिर गया है. फिलहाल, लोकसभा में 66 महिला सांसद हैं, मतलब कुल संख्या का 12.6%, जबकि 1 जनवरी, 2019 तक वर्ल्ड एवरेज 24.3 फीसदी था. मतलब कि दुनिया से हम लोग करीब आधा पीछे चल रहे हैं. तो क्या अपना देश महिलाओं के नेतृत्व पर भरोसा नहीं करता है? इंडिया स्पेंड की एनालिसिस में कई बड़े फैक्ट सामने आए हैं.

फोटो- सोशल मीडिया

क्या है पिछले 6 दशकों का हाल?

भारत की आबादी में फिलहाल महिलाओं की हिस्सेदारी 48.5 फीसदी है, मतलब की करीबन आधा. लेकिन संसद में ये हिस्सेदारी दशकों से बहुत कम दिखती आ रही है. साल 1952 की पहली लोकसभा और 2014 की सोलहवीं लोकसभा के बीच महिला सांसदों की हिस्सेदारी तो 8 फीसदी बढ़ी है, लेकिन अब भी ये मामूली है. इसे 2019 में और बढ़ाने की जिम्मेदारी पूरे देश की ही. इंडिया स्पेंड की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 1952 में लगभग 80 लाख भारतीय महिलाओं के लिए एक महिला सांसद थी. 2014 तक ये 90 लाख से अधिक महिलाओं के लिए एक थी.

विधानसभा में तो हालत और खराब है

राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के प्रतिनिधत्व की हालत तो संसद से भी खराब है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पांच साल में 2017 तक, राज्य विधानसभाओं में महिला प्रतिनिधित्व बिहार, हरियाणा और राजस्थान (14 फीसदी) में सबसे अधिक था. मिजोरम, नागालैंड और पुड्डुचेरी के विधानसभाओं में कोई निर्वाचित महिला प्रतिनिधि नहीं थी. राज्य विधानसभाओं और राज्य परिषदों में महिलाओं का राष्ट्रीय औसत क्रमशः 9 फीसदी और 5 फीसदी रहा.

फोटो- लोकसभा

इसकी वजह क्या है?

ऐसे में इसके पीछे की वजह जान लेना जरूरी है. इंडिया स्पेंड में EPW की एक रिपोर्ट का हवाला दिया गया है जिसके मुताबिक, इसके पीछे के कुछ अहम कारणों में संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण का अभाव, महिलाओं को टिकट देने के लिए राजनीतिक दलों के बीच अनिच्छा, महिलाओं के बीच चुनावी राजनीति के बारे में जागरूकता की कमी और परिवार के समर्थन की कमी शामिल है.

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